रिफाइंड–सरसों तेल के दामों में बड़ी गिरावट, जानिए आज कितना सस्ता हुआ । Cooking Oil Price

By Shreya

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Cooking Oil Price – महंगाई की मार झेल रहे भारतीय परिवारों के लिए सुखद समाचार है। देश भर में रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेलों की कीमतों में उल्लेखनीय कमी आई है। विशेषकर रिफाइंड तेल और सरसों के तेल की दरें पिछले कुछ सप्ताहों में काफी नीचे आ गई हैं। यह परिवर्तन आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ खानपान उद्योग से जुड़े व्यवसायियों के लिए भी सकारात्मक संकेत लेकर आया है।

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बीते कुछ माह तक खाना बनाने वाले तेलों के मूल्य आसमान छू रहे थे, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों का मासिक खर्चा बुरी तरह प्रभावित हुआ था। रोजाना की रसोई में तेल एक अनिवार्य सामग्री है और इसकी बढ़ती कीमतों ने घरेलू बजट को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। अब जबकि दाम कम हुए हैं, लोगों में आशा की किरण जगी है कि जीवन यापन की लागत में कुछ राहत मिलेगी।

कीमतों में कमी का मूल कारण

सरकार ने आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं पर लगने वाले गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स की दरों की पुनर्समीक्षा की और कर भार में कटौती का निर्णय लिया। इस कदम के पीछे मूल उद्देश्य यह था कि सामान्य नागरिकों को आर्थिक राहत प्रदान की जाए और दैनिक उपयोग की वस्तुएं उचित मूल्य पर सुलभ हों। खाद्य तेल इस श्रेणी का सबसे महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि देश के प्रत्येक घर में इसकी दैनिक आवश्यकता होती है।

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जीएसटी में छूट से तेल निर्माताओं, शोधन इकाइयों और वितरकों की परिचालन लागत में महत्वपूर्ण कमी आई है। जब उत्पादन श्रृंखला में व्यय घटता है, तो इसका प्रत्यक्ष प्रभाव अंतिम उपभोक्ता मूल्य पर पड़ता है। यही कारण है कि वर्तमान में बाजार में खाद्य तेलों की दरों में नरमी देखी जा रही है।

बाजार में सुधार के संकेत

थोक बाजारों से लेकर खुदरा विक्रेताओं तक, हर स्तर पर मूल्य में गिरावट का रुझान स्पष्ट है। व्यापारी बताते हैं कि कर में राहत मिलने के पश्चात आपूर्ति श्रृंखला में सुधार आया है और माल के भंडारण पर दबाव कम हुआ है। परिणामस्वरूप दुकानदार अब ग्राहकों को पहले की तुलना में किफायती दरों पर तेल बेच पा रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, बाजार में विभिन्न कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र हुई है। अनेक ब्रांड अब उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए आकर्षक मूल्य और विशेष योजनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं। यह प्रतिस्पर्धात्मक माहौल अंततः खरीददारों के पक्ष में साबित हो रहा है।

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सरसों के तेल में मिली राहत

भारतीय पाक परंपरा में, विशेषकर उत्तरी प्रांतों और ग्रामीण अंचलों में, सरसों के तेल का विशिष्ट महत्व है। इसकी विशेष सुगंध और स्वाद पारंपरिक भोजन को विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं। जब इसके मूल्य शिखर पर थे, तब अनेक परिवारों ने विवशतावश इसका उपयोग सीमित कर दिया था।

वर्तमान बाजार सर्वेक्षण के अनुसार, सरसों का तेल अब प्रति क्विंटल लगभग पंद्रह हजार छह सौ से पंद्रह हजार सात सौ रुपये की सीमा में उपलब्ध है। पूर्व में यही मूल्य सत्रह हजार रुपये प्रति क्विंटल के आसपास पहुंच गया था। यह गिरावट उन परिवारों के लिए विशेष रूप से लाभदायक है जो अपने दैनिक भोजन में सरसों के तेल का अधिक मात्रा में उपयोग करते हैं।

रिफाइंड तेल की कीमतों में सुधार

महानगरों और शहरी क्षेत्रों में रिफाइंड तेल की मांग सर्वाधिक रहती है। घरेलू रसोई के अलावा होटल, भोजनालय और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में इसका व्यापक उपयोग होता है। जब रिफाइंड तेल प्रति किलोग्राम एक सौ साठ से एक सौ सत्तर रुपये तक पहुंच गया था, तब छोटे व्यवसायियों के लिए परिचालन खर्च वहन करना कठिन हो गया था।

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अब खाद्य तेलों की कीमतों में आई कमी के फलस्वरूप रिफाइंड तेल की दर प्रति किलोग्राम लगभग एक सौ पैंतालीस से एक सौ पचास रुपये के स्तर पर आ गई है। यह कमी संख्या में भले छोटी प्रतीत हो, किंतु मासिक गणना में देखें तो एक सामान्य परिवार के लिए पर्याप्त बचत का साधन बनती है।

घरेलू अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

तेल की दरों में कमी का प्रत्यक्ष असर पारिवारिक बजट पर होता है। प्रत्येक परिवार की मासिक आय का एक बड़ा भाग खाद्य सामग्री पर व्यय होता है। जब इनमें से किसी आवश्यक वस्तु का मूल्य घटता है, तो समग्र व्यय में संतुलन स्थापित होता है। सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह राहत अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति में खर्च होता है।

खाद्य तेलों के दाम में आई गिरावट से परिवार अपनी बचत को शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक क्षेत्रों में निवेश कर सकते हैं। यह बदलाव मध्यम और निम्न वर्गीय परिवारों की जीवन गुणवत्ता में सुधार लाने में सहायक होगा।

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व्यवसाय जगत को लाभ

तेल की कीमतों में कमी का फायदा केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है। खानपान उद्योग, मिठाई विक्रेता, स्ट्रीट फूड विक्रेता और लघु खाद्य व्यवसाय भी इससे लाभान्वित हो रहे हैं। उनकी निर्माण लागत में कमी से लाभ मार्जिन में वृद्धि हुई है।

यह प्रभाव भविष्य में खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी परिलक्षित हो सकता है। यदि उत्पादन लागत नियंत्रित रहती है, तो संभावना है कि बाहर मिलने वाले खाद्य पदार्थ भी अपेक्षाकृत सस्ते हो सकते हैं। यह छोटे उद्यमियों और स्टार्टअप के लिए भी प्रोत्साहनकारी है।

यद्यपि वर्तमान में खाद्य तेलों की कीमतों में गिरावट राहतदायक है, परंतु बाजार विशेषज्ञों का मत है कि यह स्थिति चिरस्थायी नहीं हो सकती। आगामी महीनों में उत्सव और विवाह का मौसम प्रारंभ होगा, जो तेल की मांग में वृद्धि करेगा।

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इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों और कच्चे तेल के मूल्यों में उतार-चढ़ाव भी देश के घरेलू बाजार को प्रभावित करता रहता है। यदि आयात महंगा होता है या उत्पादन में कमी आती है, तो दरें पुनः बढ़ सकती हैं। इसलिए उपभोक्ताओं को सतर्क रहने की आवश्यकता है।

खरीददारों के लिए सुझाव

मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए यह उपयुक्त समय हो सकता है कि वे अपनी आवश्यकता के अनुरूप खाद्य तेल की खरीदारी करें। यदि उचित भंडारण की सुविधा उपलब्ध है, तो कुछ अतिरिक्त मात्रा रखना भविष्य में संभावित महंगाई से सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

तथापि, आवश्यकता से अधिक क्रय या जमाखोरी से बचना आवश्यक है। विभिन्न नगरों और बाजारों में मूल्यों में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए खरीदारी से पूर्व स्थानीय दरों की तुलना अवश्य करें। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों में कीमतों की जांच करना बुद्धिमानी होगी।

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सरकारी नीति का महत्व

जीएसटी दरों में कटौती का यह निर्णय महंगाई से जूझती जनता के लिए एक स्वागतयोग्य कदम है। यह दर्शाता है कि सरकार आवश्यक वस्तुओं को जनसामान्य की पहुंच में रखने के लिए प्रतिबद्ध है। खाद्य तेलों की कीमतों में आई गिरावट इसी नीतिगत पहल का परिणाम है।

अर्थशास्त्रियों का विचार है कि ऐसी नीतियां न केवल उपभोक्ताओं को तत्काल राहत प्रदान करती हैं, बल्कि बाजार में मांग को भी प्रोत्साहित करती हैं। जब लोगों के पास व्यय के लिए अधिक संसाधन होते हैं, तो समग्र अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। यह चक्रीय प्रभाव विकास को बढ़ावा देता है।

रिफाइंड और सरसों के तेल की कीमतों में हालिया गिरावट देश की जनता के लिए महत्वपूर्ण राहत का संदेश है। खाद्य तेलों की दरों में नरमी से घरेलू बजट को संभालना सरल हुआ है और महंगाई का दबाव कुछ सीमा तक कम हुआ है।

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भले ही भविष्य में मूल्यों की दिशा पर अनेक कारक प्रभाव डाल सकते हैं, किंतु वर्तमान में यह गिरावट उपभोक्ताओं के हित में साबित हो रही है। आशा है कि आगे भी शासन और बाजार मिलकर सामान्य जनता को आर्थिक राहत प्रदान करने की दिशा में सकारात्मक पहल करते रहेंगे। यह बदलाव एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत है।

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